11 मार्च 2013 - 20:30

ग्यारह सितम्बर के हमलों में तीन हज़ार लोगों का मारा जाना डिज़र्ट स्टार्म आपरेशन के बाद सऊदी अरब में अमरीका की न्यू इम्रिितयालिस्ट की मौजूदगी का पलट वार था

हर एक्शन का बिल्कुल उसी के जैसा लेकिन उसकी उलटी दिशा में रिएक्शन होता है। यह फ़िज़िक्स में न्यूटन का क़ानून है। ज्यो पॉलिटिक्स में इसे पलटवार कहा जाता है जैसे किसी एक इलाक़े में फ़ौजी आपरेशन का उलटा नतीजा किसी दूसरी जगह बरामद हो। 11 सितम्बर 2011 का हमला ऐसा ही एक पलटवार था। इनसे एक दशक पहले जार्ज बुश (बाप) ने क़ुवैत से सद्दाम को बाहर भगाने के लिये पाँच लाख की फ़ौज भेजी थी। आपरेशन कामयाब रहा और उसके बाद ईराक़ पर कड़ी पाबंदियां लगा दी गईं और सऊदी अरब में अमरीकी फ़ौज के ठिकाने बना लिये गए। मुसलमानों की पाक ज़मीन पर काफ़िरों की मौजूदगी और इराक़ की परेशानियों ही के कारण ओसामा बिन लादेन नें अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान किया था। यह बात उसनें अपने ऐलान में कही थी।ग्यारह सितम्बर के हमलों में तीन हज़ार लोगों का मारा जाना डिज़र्ट स्टार्म आपरेशन के बाद सऊदी अरब में अमरीका की न्यू इम्रिितयालिस्ट की मौजूदगी का पलट वार था। अब अफ़रीक़ी मुल्क माली में, जहाँ अलक़ायदा और उसके समर्थकों नें मुल्क के आधे उत्तरी हिस्से यानी कि अमेरिका के टेक्ज़ास स्टेट के जितने एरिये पर क़ब्ज़ा कर रखा है, अमेरिका और पश्चिम को लीबिया में की अपनी कार्यवाही के पलटवार का सामना है। कैसे? अमेरिका के समर्थन से लीबिया पर की गई बमबारी के नतीजे में करनल क़ज़्ज़ाफ़ी 2011 में जनता का आँदोलन कुचलने में नाकाम रहा, उसकी हुकूमत का तख़्ता उलटा और विरोधियों के हाथों मारा गया।माली के तवारीक़ क़बीले के योद्धाओं को क़ज़्ज़ाफ़ी नें बाग़ियों के मुक़ाबले के लिये अपनी फ़ौज में भर्ती कर रखा था। पश्चिमी हमलों के बाद यह लोग या लीबिया से भाग गए या निकाल दिये गए। लेकिन जब गए तो अपने साथ भारी हथियार भी ले गए और अपने मुल्क के उन लोगों के दरमियान जा पहुँचे जिनके साथ (हुकूमत की तरफ़ से) अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था और इसी कारण दक्षिणी माली से अलग होकर अपनी हुकूमत बनाने की कोशिशों में थे।लेकिन उत्तरी माली को दक्षिणी माली से अलग करने के लिये उनके शाना बशाना लड़ने वाले योद्धा तवारीक़ के ख़िलाफ़ हो गए और हुकूमत से किनारे लगा दिया। अन्सारुद्दीन और अलक़ायदा नें मोरक्को में तालेबान की तरह उत्तरी माली की तमाम ग़ैर इस्लामी इबादतगाहें गिरा डालीं और शरीयत का निर्दयीय प्रचार शुरू कर दिया। इन लोगों की तरफ़ से बनाए गए सख़्त क़ानूनों के किसी भी तरह के विरोध पर लोगों को सख़्त सज़ाएं दी जाने लगीं लेकिन यह तो स्ट्रेटजिक मुसीबतों का एक हिस्सा था। अमेरिका की ट्रेंड की हुई माली फ़ौज बाग़ियों के मुक़ाबले में टूट गई और अमरीका के सिखाए फ़ौजी सर्विस छोड़कर जिहादियों से जा मिले। अमरीका के फ़ोर्ट बेनेनिंग में ट्रेनिंग लेने वाले एक फ़ौजी नें डेमोक्रेटिक सरकार का तख़्ता उलट कर मुल्क पर क़ब्ज़ा कर लिया।पिछले दस महीनों से हालात और भी बुरे हो गए हैं। इस महीने में जिहादियों नें कोना शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया और मोपती शहर तक जा पहुँचे जो कि मुल्क को उत्तरी हिस्से को दक्षिणी हिस्से से अलग करने वाली लकीर के दक्षिण में है। दूसरी ओर मोरितानिया से माली में आने वाले इस्लाम पसंदों नें राजधानी बामाको से 250 मील दूर दियाबाली शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया और ऐसा लग रहा था कि पूरे माली पर अलक़ायदा का क़ब्ज़ा होने वाला है। फ़्रांस नें किसी दौर में अपने अधीन रहे माली की इस हालत पर स्टैण्ड लेते हुए इस्लाम पसंदों पर बमबारी के लिये जंगी जहाज़ भेज दिये और दियाबाली को अलक़ायदा से छुड़ाने के लिये 25 हज़ार फ़्रेंच सिपाही भी आ पहुँचे। जंग चल रही है। 16 मुल्कों से मिलकर बनी पश्चिमी अफ़रीकी मुल्कों की इकनॉमिकल सुसाइटी नें कहा है कि माली में उसके फ़ौजियों की संख्या बढ़ गई है। इनका काम मुल्क के उत्तरी हिस्से को अलक़ायदा से वापस लेना है।ऐसे माहौल में कि जब अमरीका नें फ़्रांस की इन्टेलीजेंस मदद की ज़िम्मेदारी ले रखी है। अमेरिकन डिफ़ेंस मिनिस्टर लियोन पनेटा का कहना है कि उनकी फ़ौजें माली की ज़मीन पर नहीं उतरेंगी। फ़्रांस की ज़मीनी फ़ौज और अमरीका के हवाई हमलों से शायद माली का उत्तरी हिस्सा अलक़ायदा से वापस लिया जा सके लेकिन यही काम मुल्क के दक्षिण में करने के लिये कौन आगे बढ़ेगा?2500 की फ़्रेंच आर्मी अज़ाविद के बड़े जंगली इलाक़े (उत्तरी हिस्से) पर क़ब्ज़ा नहीं कर सकती। अगर टिम्बकटू जैसे उत्तरी शहरों को वापस भी तब भी अलक़ायदा की गोरिल्ला हमलों के कारण उसे बचा के रखना असम्भव है। इस सब के बावुजूद फ़्रांस के राष्ट्रपति फ़्रांस्वा औलांड का कहना है कि वह माली की अखण्डता बहाल करेंगे।इससे पहले फ़्रेंच आर्मी की बमबारी से आम लोगों का नुक़सान हुआ है जिसके नतीजे में फ़्रांस को पलटवार का सामना करना पड़ सकता है। इस मुल्क में हज़ारों माइग्रेंट मुसलमान रहते हैं और इसे अल्जीरिया के साथ 1954 से 1962 तक आठ साला जंग के दौरान आंतरिक आतंकवाद का अनुभव भी है।इस सप्ताह अल्जीरिया में पश्चिमी शहरियों का अपहरण इस्लाम पसंदों का पलटवार है। इसलिये कि अल्जीरिया की हुकूमत नें फ़्रांस को उत्तरी माली पर हमले के लिये अपनी हवाई सीमाएं इस्तेमाल करने की इजाज़त दे रखी है।एक तरफ़ सीरिया में सिविल वार नें जिहादियों को पनपने का अवसर दे दिया है और दूसरी तरफ़ फ़्रांस के ख़िलाफ़ अफ़रीकी तट के इलाक़े में (मुस्लिम) जिहादी लड़ रहे हैं। यह (कई तरह के) पलटवार का कारण बन सकता है। तनाव पूर्ण मध्य पूर्व के मुसलमान अपने पैग़म्बर के सिपाहियों की धरती पर एक और पश्चिमी जंग कैसे बर्दाश्त कर पाएंगे? माली के इतनी ज़्यादा ज्यो पॉलिटिकल अहमियत न सही लेकिन इस मुल्क के उत्तरी हिस्से का अलक़ायदा बड़ा और महफ़ूज़ ठिकाना बन जाना यू. एस. ए. के लिये बड़ी समस्या खड़ी कर देगा।रिपोर्टों के अनुसार उत्तरी माली में अलक़ायदा बोको हराम के आतंकवादियों से मिली हुई है। यह लोग नाईजीरिया में ईसाइयों को मार रहे हैं और चर्चों को आग लगा रहे हैं। अब जब मॉरीतानिया के इस्लाम पसंदों के भी माली पहुँचने की ख़बरें आ रही हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि यह कैंसर फैलता जा रहा है।क्या करना चाहिये?यू. एस. ए. माली पर चढ़ाई नहीं कर सकता। वहाँ उसे अपना कोई फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा है। अगर वह यहाँ भी हमला करता है तो यह मुल्क उसके लिये अफ़रीक़ा में अफ़ग़ानिस्तान बन जाएगा। लेकिन अगर अमेरिका अज़ाविद को अलक़ायदा से छुड़ाने की कार्यवाही नहीं करता तो यह काम कौन करेगा? अफ़रीक़न इकॉनॉमिक्स सुसाईटी, नाटो या अल्जीरिया?यू. एस. ए. के बिना कोई और तो अज़ाविद को आज़ाद कराने के बारे में सोचेगा भी नहीं। न हथियार आएंगे और न लड़ने के लिये फ़ौज। इसके बावुजूद जब अमरीकी अपने सामने सारे आप्रेशन रखते हैं तो ओबामा कहते हैं कि अलक़ायदा आ रहा है और उसे हराना होगा।